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Wednesday, November 2, 2011

my poetry: गहरी-चिंता

my poetry: गहरी-चिंता: गहरी चिंता मे , मै बैठा हूँ | असमंजस मे , मै बैठा हूँ | क्या करूँ , ये समझ न आये | हाथ धरे , मै बैठा ...

Tuesday, November 1, 2011

गहरी-चिंता


गहरी चिंता मे , मै  बैठा हूँ |
असमंजस मे , मै  बैठा हूँ |
              क्या करूँ , ये समझ न आये |
                हाथ धरे  , मै बैठा हूँ ||

दिल कि सुनूँ , या दिमाग कि |
ख्यालों मे बस बैठा हूँ  |
                  रात को नींद , न दिन को चैन |
                 जलती आग सी धूप मे ,  मै बैठा हूँ |

हँसता था ; मै भी कभी |
अपनी ही धुन मे ,  खोया रहता था |
                 आज मायूस सा, मै  बैठा हूँ |
                  भविष्य चिंता मे बैठा हूँ |
गहरी चिंता मे बैठा हूँ ,हाथ धरे मै बैठा हूँ |

आज दिल से आवाज निकली ,
झंकृत होकर ही निकली |
                 यूँ ही चुप-चाप ,क्यूँ बैठे हो |
                    हाथ धरे क्योँ बैठे हो |

my poetry: नासमझी

my poetry: नासमझी: समझ न सकोगी , कभी तुम मुझे | मुझे इसकी परवाह थी भी नहीं | पर आस एक जरूर थी ; रोवोगी , दिल से मई...

नासमझी


समझ न सकोगी , कभी तुम मुझे |
मुझे इसकी परवाह थी भी नहीं |
                     पर आस एक जरूर थी  ;
                     रोवोगी , दिल से  मईअत मे जरूर मेरे |

जब पास था तो मुस्कुरा न सकी ;
दूर होके भी पछता न सकी | 
                     फिर कैसे  , दूरी खली आज तुम्हे |
                     जो याद किये , तुम आज मुझे  ||